Friday, November 27, 2009


गज़ल
ये गज़ल भी प्राण भाई साहिब के आशीर्वाद और संवारने से कहने लायक बनी है।

हौसला दिल में जगाना साथिया
देश दुश्मन से बचाना साथिया

जो करे बस सोच कर करना अभी
फिर न तू आँसू बहाना साथिया

क़ैद कर् पलकों में रखना हर घड़ी
यूँ बना काजल सजाना साथिया

जान हाल-ए- दिल न ले तेरा कहीं
चेहरा ऎसे छुपाना साथिया

कौन कहता है तुझे अब आदमी
भ्रूण मारे क्यों,बताना साथिया

रूप उसका जान का दुश्मन बना
प्रेम का जलवा दिखाना साथिया

छोड़ कर चल दे मुसीबत में कोई
दोस्त कैसा वो,बताना साथिया

दोस्ती निर्मल है "निर्मल" की सदा
जब जी चाहे आज़माना साथिया

Wednesday, November 25, 2009

मेरे ब्लाग की आज वर्षगाँठ है
कल मेरा जन्म दिन था । आप सब की इतनी शुभकामनायें पा कर अभिभूत हूँ। पता नहीं क्यों मेरी हर खुशी के साथ गम की कोई न कोई दास्ताँ क्यों जु ड जाती है। अब 26/11 की घट्ना को भी शायद कभी भूल नहीं पाऊँगी। इतनी खुश शायद मैं कभी नहीं हुई थी।

सुबह पोस्ट लिखी तो दिन मे ये घटना घट गयी। और दूसरी परेशानी, ये कि कल रात को जब पोस्ट लिखने लगी तो देखा टिप्पणी और पोस्ट वाला विजेट गलत सँख्या बता रहा था। बहुत परेशान हुई । कल दोपहर को 3500 तक टिप्पनी पहुँच गयी थी मगर रात को 405 दिखाने लगा। क्या कोई इसका कारण बता सकता है? खैर मैने फिर सभी पोस्ट और टिप्पनियाँ गिनी ।कुछ पोस्ट भी गायब लगती हैं । आज फिर देखती हूँ। खैर अब बात करती हूँ आज की। आज मेरे ब्लाग की पहली वर्षगाँठ है।
एक साल मे 172 -- प्रविष्टियाँ और 3510 कमेन्ट्स इस के अतिरिक्त मेरा दूसरा ब्लाग वीराँवल गाथा भी है जिस पर केवल 11 प्रविश्टियाँ ही डाल पाई वहाँ कमेन्ट्स पता नहीं कितने हुये । बहुत से फालोयर --- मुझ जैसी अल्पग्य के लिये बहुत बडी उपल्ब्धि है।
मेरे ब्लाग के जन्म की कहानी भी बहुत रोचक है।दिसम्बर 2007 मे रिटायर होने के बाद हम अपने नये घर मे आ गये नया मोहल्ला और नया घर यहाँ मन नहीं लगता था लोग तो नंगल के ही जाने पहचाने थे मगर जो घर जैसे सम्बन्ध पहले वाली जगह बन गये थे वैसे यहाँ नहीं थे। कुछ एक माह बाद छोटी बेटी की शादी तय हो गयी तो उसमे समय कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। 1 नवम्नर 2009 मे बेटी की शादी की। अब ब्च्चों को भी चिन्ता हुई कि मम्मी पापा अकेले हैं दिल कैसे लगेगा। मेरे छोटे दामाद ललित जी से आप पहले भी मिल चुके हैं। शादी पर उनके दोस्त सिरिल जी [ब्लागवाणी वाले} ने उनके कान मे फूँक मार दी कि अगर पत्नि को खुश रखना है तो पहले सासू माँ को खुश करना होगा। बस जब पहली बार ललित शादी के बाद मेरे पास 25 नवम्बर को आये तो शाम को सिरिल जी को फोन लगा दिया कि यार अब कोई तरीका भी बताओ कि सासू माँ को कैसे खुश किया जाये। वो एक लेखिका हैं। बस फिर क्या था, सिरिल जी ने झट से ब्लाग बनाने का मश्विरा दे डाला। मैने कहा भी कि मुझे कम्पयूटर तो आता नहीं ब्लाग क्या खाक चलाऊँगी? मगर ललित ने मेरा ब्लाग उसी समय बना दिया और मुझे टाईप करना भी सिखा दिया। बाकी सब कुछ डेस्क टाप पर रख दिया कि यहाँ यहां कलिक करना है। बस फिर क्या था हम भी बन गये ब्लागर । अब हाल ये है कि ललित खुद तो दिल्ली मे बैठे मुस्कुरा रहे हैं और हमारे पास कहीं नज़र उठा कर देखने का समय नहीं है। 2-3 महीने तो इन्टरनेट का बिल 600 के आस पास आया मगर फिर 2000 से उपर जाने लगा तो पति देव भी कुछ कसमसाये। ये शौक तो बहुत मंहगा है। फिर बच्चों ने उनसे कहा कि आप अनलिमिटिड कनेक्शन ले लें।उसमे 750 रुपये लगेंगे बस फिर पति देव ने हिसान किताब लगाया कि अगर मैं सारा दिन खाली रहूँगी तो जरूर मेरा मन अपनी सहेलियों से मिलने को करेगा । अगर महीनी मे चार पाँच चक्कर भी शहर के लगाने गयी तो 500 का तो पट्रोल ही फूँक देगी { ये भी एक बहुत बडी बात है, नहीं तो भारतिय पति शराब पर तो खर्च कर सकते हैं मगर पत्नि के शौक के लिये हर माह इतना खर्च करना कहाँ सहन कर सकते हैं } इससे अच्छा ये कनेक्शन ही ले लेते हैं क्यों कि मुझ से अधिक उन्हें इस का फायदा था।वो तो अपनी किताबों मे इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास बात करने का भी समय नहीं होता।चलो इसी बहाने वो अपनी शाँति तो बरकरार रख ही सकते हैं। कुछ सोशल सर्विस मे समय निकल जाता है। पहले हाल ये था कि मुझे बात करने के लिये देखना पडता कि कब किताब छोडें मैं बात करूँ । जैसे ही बात शुरू करती वो अपना काम करते हुये इधर उधर चले जाते और मुझे पूरी बात करने के लिये उनके पीछे पीछे जाना पडता कई बा्र इसी बात पर मैं नाराज़ हो जाती । यूँ भी मुझे हूँ हाँ मे ही निपटा देते । मुहल्ला पुराण न तो इन्हें अच्छा लगता है न मुझे।
जब से बलाग्गिंग शुरू की है मैं जरूरी बात करना भी भूल जाती हूँ और हाल ये है कि इन्हें बार बार मुझ से बात करने के लिये मेरे पास आना पडता है। अब मेरे पास टाईम नहीं होता मैं भी इन्हें हूँ हाँ मे ही निपटा देती हूँ। सब्जी की कडाही और कुकर कितनी बार जला चुकी हूँ। इन्हें पता है कि सब्जी गैस पर रख कर भूल जाऊँगी और जल जायेगी।अपने कमरे मे से आवाज़ लगा कर मुझे याद दिलाते रहते हैं।आगे कभी ये बाहर से देर से आते तो प्रश्नों की झडी लगा देती, अब कभी भी आयें मैं आराम से ब्लाग पर काम करती रहती हूँ। कई बार खुद आ कर कुछ बताने लगते हैं तो हूँ हाँ करती रहती हूँ मुझे लगता है ये सब अब गैर जरूरी बातें हैं । फिर इनके होते मैं बाहर की टेंशन क्यों लूँ?
तो है न सब के लिये फायदे का सौदा? मुझे शुरू से महमानवाज़ी बहुत पसंद है अब एक दो महमान आ जायें तो लगता है कि बहुत समय खराब हो गया। पहले मैं रोज़ पोस्ट लिखती थी फिर एक दिन छोड कर्। मगर पिछले कुछ दिनों बिमार हुई तो अब कई कई दिन बाद पोस्ट लिखने लगी हूँ दूसरा बेटी और नातिन साल बाद USA से आयी हैं उनके साथ भी मस्त हूँ। बस कुछ दिन मे ही पहले वाले रुटीन मे आ जाऊँ गी।
एक और बात ब्लागिन्ग ने मुझे बहुत से रिश्तों की खुशी दी है मेरे बेटे बेटियाँ भाई बहने इतना बडा परिवार है कि ये खुशी मुझ से सँभाले नहीं सम्भलती। और आप सब का प्यार और प्रोत्साहन पा कर अभिभूत हूँ। हाँ कुछ दिन से सभी ब्लाग पर नियमित रूप से नहीं जा पा रही हूँ मगर जल्दी सब की शिकायत दूर कर दूँगी। सिरिल जी का धन्यवाद करना चाहूँगी कि उन्हों ने ललित को ये मन्त्र दे कर सच मे मुझे ललित की प्रिय सासू जी बना दिया। ललित और सिरिल जी को बहुत बहुत धन्यवाद और ढेरों आशीर्वाद भी।
और आप सब का भी बहुत बहुत धन्यवाद। यहाँ अर्श बेटे का इस लिये जरूरी जिक्र करना चाहूँगी कि कम्प्यूटर की जानकारी न होने से जब शुरू मे मुझे मुश्किल आती तो अर्श ही मेरी मुश्किल दूर करते थे। उसे आशीर्वाद । एक नाम मेरे भानजे प्रदीप मेहता का जो मेरे कम्प्यूटर को टीम व्यूवर पर लगा कर ठीक करता रहता था मगर अब मैने पुराने की जगह नया कम्प्यूटर ले लिया है। प्रदीप अर्थात छोटू को बहुत बहुत आशीर्वाद। बस ये है कहानी मेरे एक साल के सफर की। अन्त मे ब्लागवाणी का धन्यवाद करना चाहूँगी जिन की वजह से मैं आज यहाँ हूँ। आशा है आप सब पहले की तरह आपना स्नेह और विश्वास बनाये रखेंगे। धन्यवाद।


Monday, November 23, 2009

गज़ल
इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है ।तभी कहने लायक बनी है।

नज़र ज़रा सी उठा के तो देख्
अपनों से शरमाना कैसा?

चाहे भी शरमाये भी तू
अब नखरा यूँ दिखाना कैसा?

आते ही जाने की जिद्द?
पल दो पल का आना कैसा?

आईना तो सच बोले है
फिर खुद को भरमाना कैसा?



जलना है बस काम शमा का
जो न जले परवाना कैसा?

मतलव के तराजू मे तोले?
प्यार का ये पैमाना कैसा?

वो तोड गये दिल चुपके से
मुहबत का नज़राना कैसा?

तकरार से दूरी मिटती नहीं
इतनी बात बढाना कैसा?


Sunday, November 22, 2009


गज़ल
ज़िन्दगी से मैने कहा कि मैं गज़ल सीखना चाहती हूँ तो उसने कहा कि तुम्हारे पास क्या है जो गज़ल लिखोगी? मैने कहा देखो इस मे काफिया भी है रदीफ भी है तो वो हंसी और बोली अरे! मूर्ख ये बहर मे नहीं है। और मैं इसे गज़ल न बना पाई। तो आप भी इस बेबहरी को ऐसे ही सुन लीजिये। आज पोस्ट करने के लिये और कुछ नहीं है न ।


चाहता हूँ खुद तेरी तकदीर लिख दूँ
खामोश होठौं पर एक तहरीर लिख दूँ

तू मिले या ना मिले कभी ज़ालिम्
दिल पर तेरे अपनी तस्वीर लिख दू

क्या दूँ तुझे इश्क मे इस के सिवा कि
तेरे नाम दिल की जागीर लिख दूँ

आओगी कभी तो कोई दुआ मांगने गर
खुद को इश्क ए फकीर लिख दूँ

मैं जानता हूँ अपनी हस्ती को ------
आ तेरे माथे की लकीर लिख दूँ

Friday, November 20, 2009

अस्तित्व [गताँक से आगे]

पिछले अंक मे आपने पढा कि रमा को अपने पति की अलमारी से एक वसीयत मिली जिसमे उनके पति ने अपने 2 बेटों के नाम सारी संपति कर दी और छोटे बेटे और रमा के नाम कुछ नहीं किया जिस से रमा के मन मे क्षोभ हुया कि उसे बिना बताये ये सब क्यों किया गया। क्या औरत केवल घर की नौकरानी है उसकी इस फैसले मे कोई अहमियत नहीं ? उसने घर छोडने का फैसला कर लियाेऔर पने पति नंद के नाम पत्र लिख कर अपनी सहेली के घर चली गयी आब आगे पढें -------
आशा के घर पहुँची1 मुझे देखते ही आशा ने सवालों की झडी लगा दी
"अखिर ऐसा क्या हो गया जो तुम्हें ऐसी नौकरी की जरूरत पड गयी1नंद जी कहाँ हैं?"
मुँह से कुछ ना बोल सकी,बस आँखें बरस रही थी महसूस् हुआ कि सब कुछ खत्म हो गया है1मगर मेरे अन्दर की औरत का स्वाभिमान मुझे जीने की प्रेरणा दे रहा था1आशा ने पानी का गिलास पिलाया,कुछ संभली अब तक वर्मा जी भी आ चुके थे1 मैने उन्हें पूरी बात बताई1 सुन कर वो भी सन्न रह गये
"देखो आशा ये प्रश्न सिर्फ मेरे आत्म सम्मान का नहीं है1बल्कि एक औरत के अस्तित्व का है क्या औरत् सिर्फ आदमी के भोगने की वस्तु है?क्या घर्, परिवार्,बच्चो पर् और घर से सम्बंधित फैसलों पर उसका कोई अधिकार नही है ! अगर आप लोग मेरी बात से सहमत हैं तो कृ्प्या मुझ से और कुछ ना पूछें। अगर आप नौकरी दे सकते हैं तो ठीक है वर्ना कही और देख लूँगी1
"नहीं नहीं भाभीजी आप ऐस क्यों सोचती हैं? नौकरी क्या ये स्कूल ही आपका है1मगर मैं चाहता था एक बार नंद से इस बारे में बात तो करनी चाहिये"
*नहीं आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे1"
" खैर आपकी नौकरी पक्की है1"
दो तीन दिन में ही होस्टल वार्डन वाला घर मुझे सजा कर दे दिया गया 1वर्माजी ने फिर भी नंद को सब कुछ बता दिया था उनका फोन आया था1मुझे ही दोशी ठहरा रहे थे कि छोटे को तुम ने ही बिगाडा है अगर तुम चाह्ती हो कि कुछ तुम्हारे नाम कर दूँ 'तो कर सकता हूँ मगर बाद में ये दोनो बडे बेटों का होगा1मैने बिना जवाब दिये फोन काट दिया 1था वो अपने गरूर मे मेरे दिल की बात समझ ही नही पाये थे1मैं तो चाहती थी कि जो चोट उन्होंने मुझे पहुँचाई है उसे समझें1
बडे बेटे भी एक बार आये थे मगर औपचारिकता के लिये शायद उन्हें डर था कि माँ ने जिद की तो जमीन में से छोटे को हिस्सा देना पडेगा1 वर्मा जी ने नंद को समझाने की और मुझे मनाने की बहुत कोशिश की मगर नंद अपने फैसले पर अडे रहे। बडे बेटे भी एक बार आये फिर चुपी साध गय।
लगभग छ: महीने हो गये थे मुझे यहाँ आये हुये1घर से नाता टूट चुका था1बच्चों के बीच काफी व्यस्त रह्ती1फिर भी घर बच्चों की याद आती छोटे को तो शायद किसी ने बताया भी ना हो1नंद की भी बहुत याद आती--पता नहीं कोई उनका ध्यान रखता भी है या नहीं वर्मा जी ने कल बताया था कि दोनो कोठियाँ बन गयी हैं1नंद दो माह वहाँ रहे अब पुराने घर मे लौट आये हैं1ये भी कहा कि भाभी अब छोडिये गुस्सा नंद के पास चले जाईये1
अब औरत का मन--मुझे चिन्ता खाये जा रही थी-ेअकेले कैसे रहते होंगे--ठीक से खाते भी होंगे या नहीं--बेटों के पास क्यों नहीं रहते--शायद उनका व्यवहार बदल गया हो--मन पिघलने लगता मगर तभी वो कागज़ का टुकडा नाचते हुये आँखों के सामने आ जाता--मन फिर क्षोभ से भर जाता
चाय का कप ले कर लान मे आ बैठी1बच्चे लान मे खेल रहे थे मगर मेरा मन जाने क्यों उदास था छोटे की भी याद आ रही थी--चाय पीते लगा पीछे कोई है मुड कर देखा तो छोटा बेटा और बहू खडे थे1दोनो ने पाँव छूये1दोनो को गले लगाते ही आँखें बरसने लगी--
"माँ इतना कुछ हो गया मुझे खबर तक नही दी1क्या आपने भी मुझे मरा हुया समझ लिया था1" बेटे का शिकवा जायज़ था1
*नहीं बेटा मै तुम्हें न्याय नहीं दिला पाई तो तेरे सामने क्या मुँह ले कर जाती1फिर ये लडाई तो मेरी अपनी थी1"
"माँ मैं गरीब जरूर हूँ मगर दिल से इतना भी गरीब नहीं कि माँ के दिल को ना जान सकूँ1मैं कई बार घर गया मगर घर बंद मिला मैने सोचा आप बडे भईया के यहाँ चली गयी हैं1पिता जी के डर से वहाँ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया
*अच्छा चलो बातें बाद मे होंगी पहले आप तैयार हो कर हमारे साथ चलो"
"मगर कहाँ?"
माँ अगर आपको मुझ पर विश्वास हैतो! ये समझो कि आपका बेटा आपके स्वाभिमान को ठेस नही लगने देगा1ना आपकी मर्जी के बिना कहीं लेकर जाऊँगा1बस अब कोई सवाल नहीं"
"पर् बहू पहली बार घर आई है कुछ तो इसकी आवभगत कर लूँ1" मन मे डर स लग रहा था कहीं नंद बिमार तो नहीं --कहीं कोइ बुरी खबर तो नहीं--या बेटा अपने घर तो नहीं ले जाना चाहता1मगर बेटे को इनकार भी नहीं कर सकी
"माँ अब आवभगत का समय नहीं है आप जलदी चलें"
अन्दर ही अन्दर मै और घबरा गयी1मन किया उड कर नंद के पास पहुँच जाऊँ वो ठीक तो हैं!मैं जल्दी से तयार हुई घर को ताला लगाया और आया से कह कर बेटे के साथ चल पडी
चलते चलते बेटा बोला-"माँ अगर जीवन में जाने अनजाने किसी से कोई गलती हो जाये तो क्या वो माफी का हकदार नहीं रहता? मान लो मैं गलती करता हूँ तो क्या आप मुझे माफ नहीं करेंगी?"
"क्यों नहीं बेटा अगर गलती करने वाला अपनी गलती मानता है तो माफ कर देना चाहिये1क्षमा तो सब से बडा दान है1बात ्रते करते हम गेट के पास पहूँच चुके थे
"तो फिर मैं क्षमा का हकदार क्यों नहीं1क्या मुझे क्षमा करोगी?"----!नंद ये तो नंद की आवाज है---एक दम दिल धडका---गेट की तरफ देखा तो गेट के बाहर खडी गाडी का दरवाजा खोल कर नंद बाहर निकले और मेरे सामने आ खडे हुये1उनके पीछे--पीछे वर्माजी और आशा थे1
"रमा आज मैं एक औरत को नहीं, अपनी अर्धांगिनी को लेने आया हूं1हमारे बीच की टूटी हुई कडियों को जोडने आया हूँ1तुम्हारा स्वाभिमान लौटाने आया हूँ1उमीद है आज मुझे निराश नहीं करोगी1शायद तुम्हारे कहने से मै अपनी गलती का अह्सास ना कर पाता मगर तुम्हारे जाने के बाद मै तुम्हारे वजूद को समझ पाया हूँ1मैं तुम्हे नज़रंदाज कर जिस मृ्गतृ्ष्णा के पीछे भागने लग था वो झूठी थी इस का पता तुम्हारे जाने के बाद जान पाया1जिसे मैं खोटा सिक्का समझता था उसने ही मुझे सहारा दिया है दो दिन पहले ये ना आया होता तो शायद तुम मुझे आज ना देख पाती1बडों के हाथ जमीन जायदाद लगते ही मुझे नज़र अंदाज करना शुरू कर दिया1मैं वापिस अपने पुराने घर आ गया वहाँ तुम बिन कैसे रह रहा था ये मैं ही जानता हूँ1तभी दो दिन पहले छोटा तुम्हें मिलने के लिये आया1 मैं बुखार से तप रहा था1 नौकर भी छुटी पर था तो इसने मुझे सम्भाला1 इसे मैने सब कुछ सच बता दिया1मैं शर्म् के मारे तुम्हारे सामने नहीं आ रहा था लेकिन वर्माजी और छोटे ने मेरी मुश्किल आसान कर दी1 चलो मेरे साथ"कहते हुये नंद ने मेरे हाथ को जोर से पकड लिया---मेरी आँखें भी सावन भादों सी बह रही थी और उन आँसूओं मे बह ्रहे थे वो गिले शिकवे जो जाने अनजाने रिश्तों के बीच आ जाते ``हैं। अपने जीवन की कडियों से बंधी मै नंद का हाथ स्वाभिमान से पकड कर अपने घर जा रही थी1-- समाप्त


Wednesday, November 18, 2009



अस्तित्व [गतांक से आगे]

पिछले अंक मे आपने पढा कि रमा को अपने पति की अलमारी से एक वसीयत मिली जिसमे उनके पति ने अपने 2 बेटों के नाम सारी संपति कर दी और छोटे बेटे और रमा के नाम कुछ नहीं किया जिस से रमा के मन मे क्षोभ हुया कि उसे बिना बताये ये सब क्यों किया गया। क्या औरत केवल घर की नौकरानी है उसकी इस फैसले मे कोई अहमियत नहीं ? अब आगे पढें---------------
*मालकिन खाना खा लें* नौकर की आवाज़ से वो अतीत से बाहर आयी
*मुझे भूख नहीं है1बकी सब को खिला दे"कह कर मै उठ कर बैठ गयी
नंद बाहर गये हुये थे1बहुयों बेटों के पास समय नही था कि मुझे पूछते कि खाना क्यों नही खाया1 नंद ने जो प्लाट बडे बेटौं के नाम किये थे उन पर उनकी कोठियां बन रही थी जिसकी निगरानी के लिये नंद ही जाते थे1इनका विचार था कि घर बन जाये हम सब लोग वहीं चले जायेंगे1
नींद नही आ रही थी लेटी रही, मैने सोच लिया था कि मैं अपने स्वाभिमान के साथ ही जीऊँगी मै नंद् के घर मे एक अवांछित सदस्य बन कर नहीं बल्कि उनक गृह्स्वामिनी बन् कर ही रह सकती थी1इस लिये मैने अपना रास्ता तलाश लिया था1
सुबह सभी अपने अपने काम पर जा चुके थे1मैं भी तैयार हो कर शिवालिक बोर्डिंग स्कूल के लिये निकल पडी1ये स्कूल मेरी सहेली के पती मि.वर्मा का था1मैं सीधी उनके सामने जा खडी हुई1
'"नमस्ते भाई सहिब"
*नमस्ते भाभीजी,अप ?यहाँ! कैसी हैं आप? बैठिये 1* वो हैरान हो कर खडे होते हुये बोले1
कुछ दिन पहलेआशा बता रही थीकि आपके स्कूल को एक वार्डन की जरूरत है1क्या मिल गई?"मैने बैठते हुये पूछा
"नहीं अभी तो नही मिली आप ही बताईये क्या है कोई नज़र मे1"
"तो फिर आप मेरे नाम का नियुक्ती पत्र तैयार करवाईये1"
"भाभीजी ये आप क्या कह रही हैं1आप वार्डन की नौकरी करेंगी?"उन्होंने हैरान होते हुये पूछा1
हाँागर आपको मेरी क्षमता पर भरोसा है तो1"
"क्या नंद इसके लिये मान गये हैांअपको तो पता है वार्डन को तो 24 घन्टे हास्टल मे रहना पडता हैआप नंद को छोड कर कैसे रहेंगी?"
*अभी ये सब मत पूछिये अगर आप मुझे इस काबिल मानते हैं तो नौकरी दे दीजिये1बाकी बातें मैं आपको बाद में बता दूँगी:।*
"आप पर अविश्वास का तो प्रश्न ही नही उठता आपकी काबलियत के तो हम पहले ही कायल हैं1ऐसा करें आप शाम को घर आ जायें आशा भी होगी1अपसे मिल कर खुश होगी अगर जरूरी हुआ तो आपको वहीं नियुक्ती पत्र मिल जायेगा।"
*ठीक है मगर अभी नंद से कुछ मत कहियेगा1"कहते हुये मै बाहर आ गयी
घर पहुँची एक अटैची मे अपने कपडे और जरूरी समान डाला और पत्र लिखने बैठ गयी--
नंदजी,
अंतिम नमस्कार्1
आज तक हमे एक दूसरे से क्भी कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं पडी1 आज शायद मैं कहना भी चाहूँ तो आपके रुबरु कह नहीं पाऊँगी1 आज आपकी अलमारी में झांकने की गलती कर बैठी1अपको कभी गलत पाऊँगी सोचा भी नहीं था आज मेरे स्वाभिमान को आपने चोट पहुँचाई है1जो इन्सान छोटी से छोटी बात भी मुझ से पूछ कर किया करता था वो आज जिन्दगी के अहम फैसले भी अकेले मुझ से छुपा कर लेने लगा है1मुझे लगता है कि उसे अब मेरी जरुरत नहीं है1आज ये भी लगा है कि शादी से पहले आप अकेले थे, एक जरुरत मंद आदमी थे जिन्हें घर बसाने के लिये सिर्फ एक औरत की जरूरत थी, अर्धांगिनी की नहीं1 ठीक है मैने आपका घर बसा दिया है1पर् आज मै जो एक भरे पूरे परिवार से आई थी, आपके घर में अकेली पड गयी हूँ1तीस वर्ष आपने जो रोटी कपडा और छत दी उसके लिये आभारी हूँ1किसी का विश्वास खो कर उसके घर मे अश्रित हो कर रहना मेरे स्वाभिमान को गवारा नही1मुझे वापिस बुलाने मत आईयेगा,मै अब वापिस नहीं आऊँगी1 अकारण आपका अपमान हो मुझ से अवमानना हो मुझे अच्छा नहीं लगेगा1इसे मेरी धृ्ष्ट्ता मत समझियेगा1ये मेरे वजूद और आत्मसम्मान क प्रश्न है1खुश रहियेगा अपने अहं अपनी धन संपत्ती और अपने बच्चों के साथ्1
जो कभी आपकी थी,
रमा1
मैने ये खत और वसीयत वाले कागज़ एक लिफाफे मे डाले और लिफाफा इनके बैड पर रख दिया1अपना अटैची उठाया और नौकर से ये कह कर निकल गयी कि जरूरी काम से जा रही हूँ1मुझे पता था कि नंद एक दो घन्टे मे आने वाले हैं फिर नहीं निकल पाऊँगी1 आटो ले कर आशा के घर निकल पडी----------क्रमश

Tuesday, November 17, 2009

अस्तित्व

कागज़ का एक टुकडा क्या इतना स़क्षम हो सकता है कि एक पल में किसी के जीवन भर की आस्था को खत्म कर दे1मेरे सामने पडे कागज़् की काली पगडँडियों से उठता धुआँ सा मेरे वजूद को अपने अन्धकार मे समेटे जा रहा था1 क्या नन्द ऐसा भी कर सकते हैं? मुझ से पूछे बिना अपनी वसीयत कर दी1 सब कुछ दो बडे बेटों के नाम कर दिया 1 अपने लिये मुझे रंज ना था, मैं जमीन जायदाद क्या करूँगी 1मेरी जायदाद तो नन्द,उनका प्यार और विश्वास था 1मगर उन्होंने तो मेरी ममता का ही बंटवारा कर दिया 1 उनके मन मे तीसरे बेटे के लिये लाख नाराज़गी सही पर एक बार माँ की ममता से तो पूछते1--काश मेरे जीते जी ये परदा ही रहता मेरे बाद चाहे कुछ भी करते1---बुरा हो उस पल का जब इनकी अलमारी में मैं राशन कार्ड ढुढने लगी थी1तभी मेरी नजर इनकी अलमारी मे रखी एक फाईल पर पडी1उत्सुकता वश कवर पलटा तो देखते ही जैसे आसमान से गिरी1 अगर मैं उनकी अर्धांगिनी थी तो जमीन जायदाद में मेरा भी बराबर हक था1 मन क्षोभ और पीडा से भर गया इस लिये नहीं कि मुझे कुछ नहीं दिया बल्कि इस लिये कि उन्होंने मुझे केवल घर चलाने वली एक औरत ही समझा अपनी अर्धांगिनी नहीं। यही तो इस समाज की विडंबना रही है1 तभी आज औरत आत्मनिर्भर बनने के लिये छटपटा रही है। मुझे आज उन बेटों पर आश्रित कर दिया जो मुझ पर 10 रुपये खर्च करने के लिये भी अपनी पत्नियौ क मुँह ताका करते हैं
भारी मन से उठी,ेअपने कमरे मे जा कर लेट गयी1 आज ये कमरा भी मुझे अपना नहीं लग रहा था1कमरे की दिवारें मुझे अपने उपर हंसती प्रतीत हो रही थी1छत पर लगे पंखे कि तरह दिमाग घूमने लगा1 30 वर्श पीछे लौत जाती हूं
"कमला,रमा के लिये एक लडका देखा है1 लडके के माँ-बाप नहीं हैं1मामा ने पाला पोसा है1जे.ई. के पद पर लग है1माँ-बाप की बनी कोठी है कुछ जमीन भी है1कोई ऐब नहीं है1लडका देख लो अगर पसंद हो तो बात पक्की कर लेते हैं"1 पिता जी कितने उत्साहित थे1
माँ को भी रिश्ता पसंद आगया 1मेरी और नंद की शादी धूम धाम से हो गयी1 हम दोनो बहुत खुश थे1
"रमा तुम्हें पा कर मैं धन्य हो गया मुझे तुम जैसी सुशील लड्की मिली है1तुमने मेरे अकांगी जीवन को खुशियों से भर दिया1" नंद अक्सर कहते1 खुशियों का ये दौर चलता रहा1 हम मे कभी लडाई झगडा नही हुआ1सभी लोग हमारे प्यार औरेक दूसरे पर ऐतबार की प्रशंसा करते1
देखते देखते तीन बेटे हो गये1 फिर नंद उनकी पढाई और मै घर के काम काज मे व्यस्त हो गये1
नंद को दफ्तर का काम भी बहुत रहता था बडे दोनो बेटों को वो खुद ही पढाते थे लेकिन सब से छोटे बेटे के लिये उन्हें समय नही मिलता था छोटा वैसे भी शरारती था ,लाड प्यार मे कोइ उसे कुछ कहता भी नहीं था ।स्कूल मे भी उसकी शरारतों की शिकायत आती रहती थी1उसके लिये ट्यूशन रखी थी,मगर आज कल ट्यूशन भी नाम की है1 कभी कभी नंद जब उसे पढाने बैठते तो देखते कि वो बहुत पीछे चल रहा है उसका ध्यान भी शरारतों मे लग जाता तो नंद को गुसा आ जाता और उसकी पिटाई हो जाती1 धीरे धीरे नंद का स्व्भाव भी चिड्चिदा सा हो गया। जब उसे पढाते तो और भी गुस्सा आता हर दम उसे कोसना उनका रोज़ का काम हो गया।
दोनो बदे भाई पढाई मे तेज थे क्यों कि उन्हें पहले से ही नंद खुद पढाते थे1 दोनो बडे डाक्टर् बन गये मगर छोटा मकैनिकल का डिपलोमा ही कर पाया1 वो घूमने फिरने का शौकीन तो था ही, खर्चीला भी बहुत था नंद अक्सर उससे नाराज ही रहते1कई कई दिन उससे बात भी नहीं करते थे। मैं कई बार समझाती कि पाँचो उंगलियाँ बराबर नही होती1 जवान बच्चों को हरदम कोसना ठीक नहीं तो मुझे झट से कह देते "ये तुम्हारे लाड प्यार का नतीजा है1" मुझे दुख होता कि जो अच्छा हो गया वो इनका जो बुरा हो गया वो मेर? औरत का काम तो किसी गिनती मे नहीं आता1इस तरह छोटे के कारण हम दोनो मे कई बार तकरार हो जाती1
दोनो बडे बेटों की शादी अच्छे घरों मे डाक्टर् लडकियों से हो गयी1नंद बडे गर्व से सब के सामने उन दोनो की प्रशंसा करते मगर साथ ही छोटे को भी कोस देते1धीरे धीरे दोनो में दूरि बढ गयी1 जब छोटे के विवाह की बारी आयी तो उसने अपनी पसंद की लडकी से शादी करने की जिद की मगर नंद सोचते थे कि उसका विवाह किसी बडे घर मे हो ताकि पहले समधियों मे और बिरादरी मे नाक ऊँची् रहे। छोटा जिस लडकी से शादी करना चाहता था उसका बाप नहीं था तीन बहिन भाईयों को मां ने बडी मुश्किल से अपने पाँव पर खडा किया था।जब नंद नहीं माने तो उसने कोर्ट मैरिज कर ली1 इससे खफा हो कर नंद ने उसे घर से निकल जाने का हुकम सुना दिया1
अब नंद पहले जैसे भावुक इन्सान नही थे1 वो अब अपनी प्रतिष्ठा के प्रती सचेत हो गये थे। प्यार व्यार उनके लिये कोई मायने नहीं रखता था 1छोटा उसी दिन घर छोड कर चला गया वो कभी कभी अपनी पत्नी के साथ मुझे मिलने आ जाता था1 नंद तो उन्हें बुलाते ही नहीं थे1 उन्हें मेरा भी उन से मिलना गवारा नहि था /मगर माँ की ममता बेटे की अमीरी गरीबी नही देखती ,बेटा बुरा भी हो तो भी उसे नहीं छोड सकती।
कहते हैँ बच्चे जीवन की वो कडी है जो माँ बाप को बान्धे रखती है पर यहाँ तो सब उल्टा हो गया था।हमारे जिस प्यार की लोग मसाल देते थे वो बिखर गया था मैं भी रिश्तों मे बंट गयी थी आज इस वसीयत ने मेरा अस्तित्व ही समाप्त कर दिया था---
"मालकिन खाना खा लो" नौकर की आवाज से मेरी तंद्रा टूटीऔर अतीत से बाहर आई\ क्रमश: